मुख्यमंत्री के कथन पर पिछले वर्ष 12वीं की परीक्षा 14 दिन में पूरी हुई थी, इस बार 12 दिनों में ही खत्म करने की तैयारी 

बोर्ड परीक्षाओं का नाम लेते ही परीक्षार्थियों के दिल की धड़कन बढ़ने लगती है, मानसिक दबाव बढ़ता है, विद्यार्थी अवसाद से ग्रस्त हो जाते हैं

विद्यार्थीयों का कहना है कि परीक्षाओं मे दो पेपर के बीच में अंतर मिलने से तैयारी में आसानी रहती है

अधिकारियों का कहना है कि अधिक समय तक परीक्षा चलने से परीक्षार्थियों पर अधिक दबाव होता है

विद्यार्थीयों के हित मे ऐसे निर्णय नेताजी कैसे लेते हैं? और अधिकारी उसे आँख-कान बंद करके कैसे बच्चों पर थोप देते हैं?

नेताओं - अधिकारियों के पास विद्यार्थीयों के हित का क्या मापदण्ड है?  

क्या कभी किसी नेता या अधिकारी ने परीक्षा के Pressure मे Suicide किया है? या वे विक्षिप्त हुये हैं।  

विद्यार्थीयों के हित मे निर्णय लेने के लिये उनकी मानसिक स्थिति को समझना जरूरी है जो कोई जरूरी नहीं समझता 

आज के शिक्षा उद्योग में बच्चों के साथ एक उत्पाद की तरह व्यवहार किया जा रहा है। हर कोई उसे बेचकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की कोशिश में है.

किसी भी परीक्षा का शेड्यूल स्टूडेंट्स का stress बढ़ा देता है, Board Exam मे Stressfree study कर ज्यादा Marks कैसे लायें? जानने के लिये यहाँ Swipe up करें 

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