बच्चे – Future of India – Bright or Dark

बच्चे – Future of India – Bright or Dark

बच्चे - Future of India
बच्चे – Future of India – Bright or Dark

Dear Friends –

अपनी गलतियों के लिये दूसरों को सजा, सदियों से वो भी अपने ही बच्चों को, पीढी दर पीढी, मेरी जानकारी मे ऐसा कोई प्रावधान, हमारे तो क्या, दुनिया के किसी भी देश के संविधान मे नही है लेकिन हम सदियों से यह दुराचार करते आ रहे हैं, इससे ये स्पष्ट है कि अपने ही बच्चों के हम सबसे बड़े दुश्मन हैं। इसे आप हमारी कुव्यवस्था की उपलब्धी कहेंगे? या हमारी लाचारी और लापरवाही, विचार किजिये!

किसी भी देश का भविष्य उस देश के बच्चे होते हैं, बच्चों की परवरिश, शिक्षा, व्यवहार, भविष्य सब हमारी सामूहिक जवाबदारी है। बच्चे का पालन-पोषण, संस्कार-शिक्षा सिर्फ पैदा करने वाले माता-पिता की ही जवाबदारी नहीं है बल्कि पूरे समाज की है और समाज के अगुआ Means सरकार इसके लिये सबसे ज्यादा जवाबदार है। वर्तमान मे देश को चलाने वाले बच्चों के लिये, कैसी नीतियों के साथ आगे बढ़ रहे हैं, उस देश का बच्चा कैसा बनेगा, ये इस पर निर्भर करता है।

देश की मुख्य समस्याये –

समस्या जीवन का ही दूसरा पहलू है। समस्या है तो जीवन है लेकिन एक समस्या का जीवन मे दोहराव (पुनरावृत्ती – Repetition) होना हमारी योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिये पर्याप्त है।

गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ, सुरक्षा, महिला-बाल शोषण, मंहगाई, किसानों की आर्थिक स्थिती आदि ऐसी कितनी ही समस्यायें हैं जिनकी पुनरावृत्ती पीढी दर पीढी हम किये जा रहे हैं। इन समस्याओं पर थोडी बहुत लीपा-पोती कर हमारे कर्णधार खुद अपनी पीठ थपथपाकर अपनी बुद्धीमतता का ढिंढोरा पीट, पीढीयों से हमें बेवकूफ बना, अपना उल्लू सीधा करते आ रहे हैं।

ये ऊंगलियों पर गिने जाने वाले मुठ्ठी भर लोग, कार्यकारी (Bureaucrats) लोगों को अपनी मुठ्ठी मे कर, मिलीभगत से, हमारे साथ ये खेल सदियों से खेलते आ रहे हैं और हम लाचारी, बेबसी, असहाय होने का रोना रोते आ रहे हैं।

समस्या के प्रति हमारा नजरिया –

मेरी चिंता का विषय यहॉ कोई समस्या नही बल्कि आप जैसे विवेकशील-बौद्धिक लोगों का  समस्याओं के प्रति, नजरिये और उनके समाधान के तरीके हैं।

मै यहॉ हमारे तथाकथित स्वकेंन्द्रीत बुद्धिजीवियों की तरह समस्या को मुद्दा बनाकर अपना हित साधने (उल्लू सीधा करने) के लिये आपसे मुखातिब नही हुआ हूं बल्कि आप समस्याओं का समूल समाधान कर ऐसे लोगों की दुकान-दारी कैसे बंद कर सकते है और उनके दिये नर्कमय जीवन से कैसे मुक्ति पा सकते हैं, ये बताना चाहता हूं।

समस्या के प्रति आपका नजरिया और उसे हल करने का तरीका कैसा हो, ये जानने के लिये हम हमारी शिक्षा नीति का उदाहरण लेते हैं।

हम सभी जानते हैं, हिंदुस्थान (हमारा देश) की शिक्षा-नीति अंग्रेज लार्ड मैकले की देन है जिसके दुष्परिणाम हम आज भी भुगत रहे हैं और अपने बच्चे का भविष्य भी नर्कमय बना रहे हैं। इस पर मै अधिक चर्चा नही करूंगा, इस संम्बन्ध मे आप जानते हैं और सारी जानकारीयॉ इंटरनेट पर भी उपलब्ध है।

स्वतंत्रता के 75 वर्षों मे भी हम समस्याओं के ऐसे समाधान की सोच तक पैदा नही कर पाये जिससे समस्या को समूल खत्म किया जा सके वर्ना आज 20-22 साल, मेहनत (पढाई) करने के बाद हमारे बच्चे ना बेरोजगार होते, ना ही भटकते (जीवन मे गलत रास्ते चुनते)।

मजदूर एक दिन की मेहनत का मेहनताना दिन खत्म होते ही ले लेता है, नौकरी-पेशा वाला महीना खत्म होने के बाद तनख्वाह के लिये एक दिन इंतजार नही करता, व्यापारी हर सौदे का तुरंत पैसा लेता है और हमारे कर्णधारों व नौकरशाहों का तो क्या ही कहना, अपनी तनख्वा (हाथी के दांत) और सुख-सुविधाओं ले लिये, वे संसद मे एकजुट होकर कानून तक बदल देते हैं, इस व्यवस्था मे जरा सी चूक पर ये लोग आंदोलन पर उतर आते हैं, देश मे अराजकता फैलाने से भी बाज नही आते।

Strikes - devratna17
Strikes

आप एक दिन भी उन्हे बहला नही सकते पर हम अपने ही बच्चे को भविष्य के सपने दिखाकर 20-22 साल तक बहलाते हुये उनसे पढाई (मेहनत – मेहनत भी ऐसी कि जिसे देखकर आप खुद आश्चर्यचकित हो जाते हैं, दंग रह जाते हैं) करवाते हैं और अपना काम खत्म करने के बाद (पढ़ाई खत्म करने के बाद) जब वो अपना मेहनताना (नौकरी-व्यापार) मॉगता है तो हम सब (Government, Private Sector) अपने वादे से मुकर कर उसे ही दोषी ठहराते हैं (पढाई से कुछ नही होता पैसा कमाने के लिये काम आना चाहिये जैसे जुमलों से उसकी  मेहनत और भरोसे को तार-तार कर देते हैं) और वो असहाय, ठगा हुआ मासूम, खुद आत्मग्लानी से भर जाता है फिर जीवन यापन के लिये बच्चे आत्मघात (गलत राह इख्तियार) करने को मजबूर हो जाता है, तब भी हम दोष उसी पर मढते हैं।

कैसे होगा समस्याओं का सही समाधान –

ऐसी अनेक समस्यायें देशवासी सदियों से झेल रहे हैं और अब तो इतने आदी हो गये हैं कि समस्या जाने बगैर ही उसके साथ जीने को राजी हो जाते हैं। बेशक देश मे समस्यायें बहुत हैं लेकिन उनका पूर्ण समाधान हमारा उसके प्रति नजरिया तय करता है। यहाँ मै आपको बच्चों कि समस्या के सही समाधान के प्रति ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ,

दूसरी समस्याओं से “बच्चों की समस्या” इसलिये अहम है क्योकि इसका समाधान होते ही देश की दूसरी कई समस्यायें (लगभग 85-90%) स्वत: ही समाप्त हो जायेंगी और कभी पैदा ही नही होंगी।

समस्याओं के समूल समाधान के लिये सही प्रश्न खडे करना जरूरी है, ऐसे कुछ प्रश्नों पर आप गौर किजिये

  1. हर बच्चा अद्वितीय जन्मता है पर आज तक हमारे पास उसकी अद्वितीय क्षमता पहचानने का कोई उपाय नही है, क्यों?
  2. एक कक्षा मे 30-40 बच्चे पढते हैं जो लगभग समान बौद्धिक स्तर के, एक ही पाठ्यक्रम, एक ही शिक्षक से, एक ही तरीके से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर सभी के प्रदर्शन मे इतना अंतर, क्यो?
  3. बच्चे का खेलने, टी वी, मोबाईल आदि मे बहुत मन लगता है लेकिन पढाई मे नही, क्यों?
  4. 20-22 साल शिक्षा प्राप्ति के बाद हासिल डिग्री, डिप्लोमा व्यवसायिक जगत मे बच्चे की योग्यता का मानक नही, क्यों?
  5. माता-पिता ये सब जानते हुये भी बच्चे के जीवन के महत्वपूर्ण 20-22 साल और अपनी मेहनत के लाखों रूपये बर्बाद कर रहे हैं, क्यों?
  6. नौकरी-पेशा को वेतन-भत्ते-पदोन्नती-पेंशन की गारंटी, किसानों को समर्थन मूल्य की गारंटी सभी को कुछ ना कुछ गारंटी चाहिये तो बच्चों को शिक्षा पश्चात तुरंत रोजगार की गारंटी, क्यो नही?
Problems & Solutions
Problems & Solutions

ऐसे सवालों के जवाब से हम समस्या का समूल समाधान प्राप्त कर सकते हैं लेकिन जवाब तब खोजे जायेंगे जब हम ऐसे प्रश्न खडे करने की सोच नीतिनिर्धारकों, कार्यपालिका के मातहतों के साथ-साथ खुद मे और आम लोगों मे भी पैदा कर सकें।

मै मानता हूं अपने कार्यकाल (जीवन) मे हजारों लोगों की समस्याओं का निराकरण करने से बेहतर एक समस्या का समूल निवारण कर पीढीयों को उससे निजात दिलाना ज्यादा कारगर है और मै नही समझता कि हम, मानवता के लिये इससे बेहतर, और कोई योगदान दे सकते हैं।

ऐसी कोई समस्या नही जिसका पूर्ण समाधान हासिल ना किया जा सके, जरूरत है तो सिर्फ “सर्वजन सुखाय” वाली नियत की, जिसका हमारे देश मे नितांत अभाव है।

हमारे देश की 70% आबादी दो-वक्त की रोटी जुटाने मे अपना पूरा जीवन गवॉ देती हैं बाकि 28% जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (रोटी, कपडा, मकान, शादी) की जद्दोजहद मे।

आज देश के सिर्फ चंद गिने-चुने लोगों ने (जो पेट की भूख से उपर उठ पाये हैं) वैश्विक स्तर पर अपना योगदान देकर हमारे देश का नाम विश्वपटल पर अंकित कर दिया है। ये बताता है कि जिन्हे मौका मिला उन्होंने विश्व को बता दिया कि भारत के लोगों मे कितनी योग्यता है।

हमारे पास योग्यता की कमी नही है, कमी है तो सिर्फ लोगों को “पेट की सोच” से उपर उठाकर उनको हृदय और मस्तिष्क का इस्तेमाल करने का मौका देने की, जो उन्हे जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं की चिंता से मुक्त कर, दिया जा सकता है और ये काम हम हमारी शिक्षा-नीति के माध्यम से ही कर पायेंगे।

लुभावने वादे कर हम विश्व का नेतृत्व नही कर सकते। विश्व नेतृत्व के लिये समस्याओं के प्रति हमारा नजरिया और उनके अचूक-समूल समाधान के तरीकों की आवश्यकता हैं लेकिन इसके लिये हर देशवासी मे पहले ऐसी सोच का पैदा होना नितांत आवश्यक है।

बच्चे को हल्के मे मत लो, ये आपको बुढ़ापे मे स्वर्ग और नरक दोनों के दर्शन करवायेंगे, आपका उनके प्रति आज का व्यवहार ये तय करेगा। Be cautious.

जय हिंन्द! जय भारत!

Start thinking, and create a circle of happiness around you.      

इस दिशा मे आपके सकारात्मक चिंतन (सोच) का अभिलाषी।

आपका शुभेच्छु

देवरत्न

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