Kya Padhai Itni Jaruri Hai

पढ़ाई – क्यों और कितनी जरूरी है?

Kya Padhai Itni Jaruri Hai
Kya Padhai Itni Jaruri Hai

Intro: आज हमारा समाज बहुत जागरूक हो गया है। समाज का हर तबका चाहे वह गरीब हो, मध्यमवर्गीय हो या अमीर, सभी पढ़ाई के महत्व को समझने लगे हैं और हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा अच्छी से अच्छी शिक्षा हासिल करे और अपने जीवन मे आगे बढ़े।

और इसके लिये हमारी सरकारें, धनपती, समाज उद्धारक लोग व संगठन भी बहुत बढ-चढ़कर काम कर रहे हैं। गरीब बच्चों को मुफ़्त शिक्षा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भारत मे जन्मे हर बच्चे को शिक्षित किया जा रहा है। कुल मिलाकर सब तरफ, हर घर मे “पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब – खेलोगे कूदोगे होगे खराब” का बहुत शोर है।

किसी से भी बात करो तो वो यही कहता है पढ़ लो Life बन जायेगी, पढ़ोगे नहीं तो जीवन मे कुछ नहीं कर पाओगे, तो क्या Life मे सफल होने के लिये पढ़ना इतना जरूरी है? क्या Life मे बगैर पढे कुछ नहीं किया जा सकता?

Life मे पढ़ाई जरूरी है या कुछ और?

आईये मिलकर इन सवालों के जवाब ढूंढते है। इन प्रश्नों को समझने के लिये मै आपको एक गरीब होनहार बच्चे कहानी सुनाता हूँ –

15 अक्टूबर 1931 को धनुषकोडी गाँव (रामेश्वरम, तमिलनाडु) में, एक मध्यमवर्ग मुस्लिम अंसार परिवार में इनका जन्म हुआ। इनके पिता श्री जैनुलाब्दीन, न तो ज़्यादा पढ़े-लिखे थे, न ही पैसे वाले थे। वे मछुआरों को नाव किराये पर दिया करते थे। इनके पाँच भाई व पाँच बहने थी, वे संयुक्त परिवार में एक ही घर में तीन परिवारों के साथ रहा करते थे।

इनके जीवन पर इनके पिता का बहुत प्रभाव रहा। इनके पिता भले ही पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनकी लगन और उनके दिए संस्कार इस बच्चे के बहुत काम आए। पाँच वर्ष की अवस्था में रामेश्वरम पंचायत के प्राथमिक विद्यालय में उनका दीक्षा-संस्कार हुआ था।

इनके शिक्षक इयादुराई सोलोमन ने उनसे कहा था कि “जीवन मे सफलता तथा अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था, अपेक्षा इन तीन शक्तियो को भलीभाँति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहिए।”

एक बार पांचवी कक्षा में इनके अध्यापक पक्षी के उड़ने के तरीके की जानकारी दे रहे थे, लेकिन जब छात्रों को समझ नही आया तो अध्यापक सबको समुद्र तट ले गए, जहाँ उड़ते हुए पक्षियों को दिखाकर अच्छे से समझाया। इन्ही पक्षियों को देखकर इस बच्चे ने तय कर लिया कि उनको भविष्य में विमान-विज्ञान में ही जाना है। इनके गणित के अध्यापक सुबह ट्यूशन लेते थे इसलिए वह सुबह 4 बजे से पहले उठकर गणित की ट्यूशन पढ़ने जाते थे।

इन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा जारी रखने के लिए अख़बार वितरित करने का कार्य भी किया था। इन्होंने 1950 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलजी से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। स्नातक होने के बाद उन्होंने हावरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने के लिये भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया।

1962 में वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में आये जहाँ उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी भूमिका निभाई। परियोजना निदेशक के रूप में भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी 3 के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जिससे जुलाई 1982 में रोहिणी उपग्रह सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था।

हम सब इन्हे डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम से जानते हैं। इनकी कहानी से आपको पढ़ाई की अहमियत समझ आ गयी होगी। अब आपको विश्वास हो गया होगा कि पढ़कर ही आप Life मे सफलता हासिल कर सकते हैं, समाज मे मान-सम्मान, उच्च पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं।

सोच ‘पढ़ाई बिन सब सून’ – कितनी सही?

सही है इसी सोच पर तो पूरा देश, समाज का हर तबका और हर माता-पिता चल रहे हैं और संचार के सभी माध्यमों से सरकारें, पूंजीपति, समाज सुधारक सभी तुम्हें इसी बात का एहसास दिलाना चाहते हैं और तुम्हें भी अब इस बात का पूरा यकिन हो गया होगा कि “पढ़ाई बिन जीवन सून”

किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले जरा रुकिये! मै आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, आपसे ही नहीं बल्कि आपके माता-पिता, सरकार और समाज सुधारकों से भी।

आप कलाम साहब को अच्छे से जानते हैं और उनसे अतिप्रेरित भी होंगे लेकिन क्या आप उनके साथ पढ़-लिखकर बड़े हुए और बाकी बच्चों के बारे मे जानते हैं। वे कौन है? क्या करते हैं? उन्होंने अपने जीवन मे क्या किया? क्या वे सभी कलाम सर की तरह Life मे सफल हुये? क्या उन्होंने वो सबकुछ पाया जो कलाम साहब को अपनी Life मे मिला? नहीं न!

आप तो क्या उनके शिक्षक भी नहीं बता सकते कि उन बाकी बच्चों का क्या हुआ! ये इस बात को साबित करने के लिये पर्याप्त है कि पढ़ाई से जीवन मे सबकुछ हासिल नहीं होता वर्ना कलाम सर की तरह उनके साथ पढ़ने वाला हर बच्चा अपनी Life मे सफल होता और उसे भी कलाम सर की तरह न सही उनसे कम ही पर लोग जानते, याद करते।

पढ़ाई सहीं पर हमारे तरीके गलत

तो क्या पढ़ाई करना बेकार है? नही, पढ़ाई Life मे बहुत उपयोगी हो सकती है लेकिन तब जब उसका तरीका सहीं हो। अभी एक सवाल और आपके जहन मे गूंज रहा होगा कि कलाम सर ने तो पढ़ाई से ही अपनी Life मे सब कुछ हासिल किया तो मै आपको बता दूँ कलाम साहब ने पढ़ाई से नहीं अपने जुनून से अपनी Life मे ये मुकाम हासिल किया था।

कलाम सर की कहानी मे आपने सुना है न उनके Teacher इयादुराई सोलोमन ने उनसे क्या कहा था। भूल गये! मै फिर एक बार आपको बताता हूँ, उन्होंने कलाम सर से कहा था कि जीवन मे सफलता तथा अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था, अपेक्षा इन तीन शक्तियो को भलीभाँति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहिए। उनकी इसी  बात को कलाम सर ने अपने जीवन मे उतार लिया और अपने लक्ष के प्रति जुनूनी बनाया।

हम सभी जानते हैं कि हमारा Indian Education System अंग्रेजों की देन है। उनका उद्देश्य स्पष्ट था, उन्हे भारत मे अपना शासन चलाने के लिये बाबू Type के लोग चाहिये थे जो उनका बताया काम तो करें पर अपने दिमाग का इस्तेमाल न करें इसलिये उन्होंने हमारे देश की गुरुकुल शिक्षा को खत्म कर ऐसी Education Policy बनाई और वे अपने उद्देश्य मे शत-प्रतिशत सफल भी हुये।

1947 मे हमे आजादी मिली लेकिन शिक्षा के मामले मे आज भी हम और हमारे बच्चे उनकी दी गई मानसिक गुलामी से आजाद नहीं हो पाये न ही इसके लिये किसी सरकार, समाज सेवकों या पूँजीपतियों ने ही कोई प्रयास किये क्योंकि इन सबका मकसद भी यही है कि आप और आपके बच्चे उनके लिये बगैर दिमाग लगाए सिर्फ काम करें।

सुधार: नकल से भी हो सकता था

इसीलिये हमारा Education System: पारंपरिक रूप से, ज्ञान के संचय और परीक्षा-उन्मुखता पर अधिक केंद्रित है। रट्टा लगाकर याद करना और उच्च अंकों पर जोर देना ही सिखाता है। हालांकि, हाल के वर्षों में कौशल विकास और समग्र विकास को जोर शोर से प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है, जो नयी और आकर्षक पैकेजिंग मे पुराना सामान बेचने जैसा है क्योंकि कौशल और समग्र विकास के लिये ITI और जाने कितने ही कॉर्सेस और कार्यक्रम पहले से ही चलाये जा रहे हैं, जो ढ़ाक के तीन पात ही साबित हुये हैं।

जबकि कई विकसित देशों में, शिक्षा प्रणाली रचनात्मकता, समस्या-समाधान, और महत्वपूर्ण सोच पर अधिक जोर देती है। बच्चे को स्वतंत्र रूप से सोचना, सवाल पूछना और सहयोग करना सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

हर क्षेत्र मे विदेशों की नकल करने मे हमारे मातहत बहुत काबिल हैं ये तो आप सभी जानते हैं लेकिन 1947 आजादी से लेकर अभी तक किस ने Education Sector मे ऐसा कोई प्रयास नहीं किया, क्यों? सोचिये फायदा किसका और नुकसान किसका!

इसी चर्चा को हम आगे भी जारी रखेंगे तब तक आप भी अपने विचार कमेन्ट कर मेरे साथ साझा करें ताकि अगले लेख मे मै आपके विचारों को भी अपने लेख मे शामिल कर सकूँ।