Jammu-Kashmir का इतिहास और Article 370

11 दिसंबर, 2023 को जब भारत के सुप्रीम कोर्ट ने Article 370 पर अपना ऐतहासिक फैसला सुनाया तो हर किसी की उत्सुकता ये जानने की हुई कि Article 370 और 35 a है क्या? और इसकी वजह से जम्मू-कश्मीर और भारत के नागरिक किस तरह से प्रभावित होते हैं? तो आइये इस बारे मे सिलसिलेवार जानते हैं।
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1947 में जब भारत और पाकिस्तान को आजादी मिली, तब विभिन्न क्षेत्रों मे रियासतें हुआ करती थीं और उनके शासको को यह स्वतंत्रता और अधिकार था कि वे किस देश में शामिल होंगे। उस व्यक्त कश्मीर के महाराजा, हरि सिंह थे जो दोनों देशों के बीच फंसे एक बहुसंख्यक मुस्लिम राज्य (जम्मू-कश्मीर) के हिंदू राजा थे और निर्णय नहीं ले पा रहे थे। लेकिन तब उन्होंने परिवहन और अन्य सेवाओं को बनाए रखने के लिए पाकिस्तान के साथ एक अंतरिम “स्टैंडस्टिल” समझौते पर हस्ताक्षर किये थे।
अक्टूबर 1947 में राजा हरि सिंह की विलंब की रणनीति से निराश और मुसलमानों पर हमलों की रिपोर्टों से प्रेरित होकर पाकिस्तान के आदिवासियों ने कश्मीर पर हमला कर दिया तब महाराजा हरि सिंह ने भारत से सैन्य मदद मांगी।
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उस वक्त भारत के गवर्नर-जनरल, लॉर्ड माउंटबेटन थे उन्हे लगा कि कश्मीर के अस्थायी तौर पर भारत में शामिल होने से शांति कायम हो सकती है, जब तक अंतिम स्थिति पर मतदान न हो जाए और उसी महीने राजा हरि सिंह ने भारत को अपने राज्य की विदेश और रक्षा नीति पर नियंत्रण सौंपते हुए विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये।
हिंदुस्तान की शांतिवादी सोच और प्रयास

जम्मू-कश्मीर के दो-तिहाई क्षेत्र पर भारतीय सैनिकों ने कब्ज़ा कर लिया और शेष उत्तरी क्षेत्र पर पाकिस्तान ने कब्ज़ा किया और 1950 के दशक में चीन ने जम्मू-कश्मीर राज्य के पूर्वी हिस्सों पर अपना कब्जा जमा लिया।
महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित Merger letter (विलय पत्र) या भारतीय सैनिकों का जम्मू-कश्मीर मे प्रवेश, पहले क्या हुआ? यही भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का प्रमुख मुद्दा रहा है। भारत का कहना है कि महाराजा हरि सिंह ने पहले हस्ताक्षर किए, जिससे भारत के सैनिकों की वहाँ उपस्थिति वैध हो गई जबकि पाकिस्तान इस बात पर अड़ा हुआ है कि महाराजा सैनिकों के आने से पहले हस्ताक्षर नहीं कर सकते थे, और इसलिए राजा हरि सिंह और भारत ने, पाकिस्तान के साथ “स्थिर” समझौते को नजरअंदाज कर दिया।
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कश्मीर की स्थिति तय करने के लिए पाकिस्तान, जनमत संग्रह की मांग करता है, जबकि भारत का तर्क है कि लगातार भारतीय राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में मतदान करके, कश्मीरियों ने भारत में अपने विलय की पुष्टि की है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा संचालित जनमत संग्रह के पक्ष में पाकिस्तान, संयुक्त राष्ट्र के कई प्रस्तावों का हवाला देता है, जबकि भारत का कहना है कि 1972 का “शिमला समझौता” दोनों देशों को राज्य-दर-राज्य आधार पर समस्या को हल करने के लिए बाध्य करता है।
इसके अलावा, कुछ कश्मीरी तीसरा विकल्प चाहते हैं – आज़ादी – जिस पर न तो भारत और न ही पाकिस्तान विचार करने के लिए तैयार है।
शिमला समझौता

दोनों देशों ने 1947-48 और 1965 में कश्मीर को लेकर युद्ध हुये, जिसने “शिमला समझौते” में मूल युद्धविराम रेखा को “नियंत्रण रेखा” (Line of कंट्रोल) के रूप में औपचारिक रूप दिया, लेकिन इससे 1999 में सियाचिन ग्लेशियर पर आगे की झड़पों को नहीं रोका जा सका, जो नियंत्रण रेखा से परे है। 2002 में भारत और पाकिस्तान एक बार फिर युद्ध के करीब आ गये थे।
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इस्लामवादी नेतृत्व वाले, 1989 में भड़के विद्रोह से स्थिति और भी जटिल हो गई थी। भारत ने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) के तहत उग्रवाद को समाप्त करने के लिए सेना को अतिरिक्त अधिकार दिये। AFSPA की समय-समय पर समीक्षा के बावजूद, यह अभी भी भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में लागू था।
कैसे बनी Article 370 & 35a?

जम्मू-कश्मीर के आखिरी शासक महाराजा हरि सिंह ने 1947 मे भारत में शामिल होने के लिये एक Merger letter (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर किए थे। 1950 में भारतीय संविधान लागू हुआ। जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद-1 के तहत भारत का एक राज्य घोषित किया गया जबकि Article 370 ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया। जम्मू-कश्मीर के संविधान का मसौदा तैयार करने को लेकर पहली संविधान सभा की बैठक 1951 मे हुई थी, जिसमें सभी सदस्य शेख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के थे।
1952 मे जम्मू-कश्मीर संविधान सभा में कश्मीर के नेताओं ने केंद्र सरकार के साथ चर्चा की, इसमें केंद्र और राज्य के संबंधों को लेकर एक समझौता हुआ। 1956 मे जम्मू-कश्मीर ने खुद को भारत का अभिन्न अंग घोषित कर दिया और अपना संविधान अपनाया। इस तरह Article 370 जो जम्मू-काशिर को एक विशेष राज्य का दर्जा देती थी और 35 a वहाँ की विधान सभा को नागरिकता को परिभाषित करने का अधिकार प्रदान करती थी।
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